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''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

May 25, 2008

लघु कविताएँ

1)अपने भीतर के जानवर को

छुपाने की कोशिश करते है,

कई लोग,

अक्सर ..... दूसरो के खोल में!

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2)वो शमा हूँ ,जो जलती रही मगर रोशनी कहीं न हुई!

वो लहर हूँ उफनती रही मगर न दामन किसी का गीला किया!

वो आंसू हूँ जो ढलका नहीं अब तक किसी के गालों पर!
हाँ ,
वो सांस हूँ जो ढली आह में मगर ,घुटती है अब तक सीने में!

[written when i was a college student]

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3)अपनी रफ्तार से जा रही है ज़िंदगी यूं तो!

मगर न जाने क्यों लगता है....

अनगिनत विराम चिन्ह

हरदम साथ चलते हैं!

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-अल्पना वर्मा