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''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

April 18, 2008

सुबह



सुबह जब मेरे दरवाज़े पर दस्तक देने,
आगे बढ़ती है,

कोहरे को छांटती हुई
तो,
उसके कदमों को, दरवाजे़ से

कुछ फासले पर लगा

एक बड़ा पेड़ रोक लेता है!

सुबह कोशिश करती है

बढ़ती है

अपने अंगरक्षकों को भेजती है

उनमें से कुछ ही जीतकर

मेरे पास पहुंचते हैं,

उससे पूर्ण अहसास नहीं हो पाता

कि,
सुबह हो गई है।

और मैं,

दरवाजे पर हल्की दस्तक को¸

हवा का झोंका समझ बंद रहने देती हूं

अंधेरे में घुटती हुई
करती रहती हूं
अपने जीवन की सुबह की प्रतीक्षा

और टटोलती रहती हूं

अंधकार में,

सुबह का जीवन में अर्थ –

[written at the age of 18]--Alpana Verma

April 6, 2008

जाने क्यूँ


जाने क्यूँ [एक गीत ]
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जाने क्यूँ मैं अनजान डगर जाती हूँ,
मिल के अनजान लम्हों से बहल जाती हूँ.

टूट कर जुड़ता नहीं ,माना के नाज़ुक दिल है,
गिरने लगती हूँ मगर ख़ुद ही संभल जाती हूँ.

ज़िंदगी से नहीं शिकवा न गिला अब कोई,
सुनसान राहों से बेखौफ गुज़र जाती हूँ.

गैर के हाथों उनके नाम की मेहँदी है रची,
जान कर ,अपनी तमन्ना में खलल पाती हूँ.

है खबर वक्त का निशाना मैं हूँ ,फ़िर भी-
उनके हाथों मिटने को मचल जाती हूँ.
--अल्पना वर्मा