Search This Blog

September 29, 2007

दिल की बात

प्यार का दरिया बहाओ,तो कुछ बात बने,
वीरान बस्ती को बसाओ,तो कुछ बात बने.

ख़ुद से करते हो क्यूं दिल की हर बात ,
अपना हमराज़ बनाओ तो कुछ बात बने .

पराई रोशनी से करते हो घर को रोशन?,
अपने अंधेरो को जलाओ तो कुछ बात बने .

नफ़रतो की आग में तन जलता है बहुत ,
प्यार हर दिल में बसाओ तो कुछ बात बने.

क्यूं उठाते हो मुठ्ठी की शक्ल में आवाज़ें ,
क़लम हथियार बनाओ तो कुछ बात बने.

सिक्कों की खनक से मुस्कराता नहीं आंसू ,
हँसता हुआ गीत सुनाओ तो कुछ बात बने .

वो फ़र्श जिस पर बहा है लहू मासूमो का ,
गवाह उस को ही बनाओ तो कुछ बात बने.

क्यूं अंधेरे उजालों पर हरदम हावी हों ,
अमावास में चाँद खिलाओ तो कुछ बात बने.

जिसकी पलकें नम ,दिल में परेशानियाँ हैं ,
'अल्प'उसको जो हंसाओ,तो कुछ बात बने .

-Alpana Verma

September 13, 2007

अमलतास के पीले झूमर

जब भी देखा तुमको,
सोचा-
पूछूँ-
रंग चुराया धूप से तुमने
या फिर कोई रोग लगा है?
झुलसते जलते मौसम में
कैसे तुम लहराते हो?
खुश्क गरम हवाओं को भी
कैसे तुम सह पाते हो?
कैसे तपती धरती को
छाया दे बहलाते हो?

झूमर कुछ पल मौन रहे,
पर-
फिर भी यूँ बोल गये,
कड़ी धूप नहीं कोई समस्या
ये तो बस है एक तपस्या,
कठिन डगर जीवन की
जो ऐसे ही तय कर पाते हैं,
वो ही रंग और संग जीत का
जीवन में पा जाते हैं।

--अल्पना वर्मा
अनुभूति हिंदी पत्रिका में [जून २००७ ]में प्रकाशित .