August 16, 2011

सबसे बड़ा लोकतंत्र !कितना सच?


आज जिस तरह से अन्ना हज़ारे के शांतिपूर्ण ,अहिंसक आंदोलन के खिलाफ सरकार ने उनको और उनके सभी टीम सदस्यों,समर्थकों को गिरफ्तार किया और अब अन्ना हजारे,मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल को तिहाड जेल में कलमाडी और राजा जैसे भ्रष्टाचारी दोषियों के साथ रखा जा रहा है...
बेहद दुखद है.लोकतंत्र आज खुद को कितना बेबस महसूस कर रहा है.

दुनिया भर में प्रसिद्ध सबसे बड़ा लोकतंत्र आज खोखला हो गया है.
यह कैसा लोकतंत्र है जिस में आज हमें बोलने की आज़ादी भी नहीं ?

अन्ना,हम यहाँ दूर बैठे सिर्फ प्रार्थना ही कर सकते हैं कि आप का यह आन्दोलन सफल हो और वर्तमान सरकार को समय रहते सुबुद्धि मिले.

वैसे ऐसी सरकार से हम अब और क्या अपेक्षा कर सकते हैं?

आज कवि दुष्यंत कुमार की लिखी दो कवितायेँ याद आती हैं..

कवि श्री दुष्यंत कुमार की दो रचनाएँ
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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
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आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
घ्रर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख।

एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख।

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख।

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।

ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख।

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख।

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यह पोस्ट अन्ना हजारे आंदोलन के समर्थन को प्रकट करने और सरकार के तानाशाह रवैये के विरोध में लिखी गयी है.
क्षमा चाहती हूँ कि यहाँ टिप्पणी का विकल्प नहीं रखा जा रहा है.
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Updated post with the video showing difference between Govt.proposed bill and Anna's Janlokpal bill--:

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-अल्पना